शनिवार, 26 मार्च 2011

आगाज ऐसा है... अंजाम कैसा होगा?

जोड़ासांकू में उल्टफेर
जोड़ासाको सीट पर अप्रत्याशित उल्टफेर यह जता रहा है कि बंगाल की अग्निकन्या हिन्दीभाषियों की उपेक्षा कर गई है। सीटिंग एम.एल.ए दिनेश बजाज के हाथ से उम्मीदवारी जाना भी लोगों को खटका था तब शांतिलाल जैन के नाम की घोषणा से बात दब गई पर अब उनकी अस्वस्थता का बहाना बनाकर श्रीमती स्मिता बख्शी की नामजदी की गई तो हिन्दीभाषी ठगे रह गये।
क्या राजनीति इस हद तक होनी चाहिए की उस क्षेत्र के मतदाताओं की मानसिकता का भी ख्याल नहीं रहे। दिनेश बजाज अपने क्षेत्र में हमेशा सक्रिय दिखे, क्षेत्र के लोगों के सुख-दुख में करीब दिखे-फिर उनका पत्ता कटना भी मतदाताओं को खला? दिनेश बजाज का अगर राजनीति में कद बढ़ने लग गया तो राजनीति का क्या यह जवाब होना चाहिए? उसके बाद शांतिलाल जैन के नाम का आना और चला जाना बिल्कुल ऐसे लगा जैसे जोड़ासांकू के मतदाताओं को निवाला दिखाया गया और फिर छीन लिया गया। सवाल तो शांतिलाल जैन पर भी है - अगर वो पहले से ही अस्वस्थ थे तो चुनावी समर में कुदने का फैसला क्यों किया? पता नहीं राजनीति अपने आपको इतनी सयानी और जनता को इतना मुर्ख क्यों समझती है।
जनता सब जानती है.... और वक्त आने पर जवाब भी देती है। मेरा विरोध श्रीमती स्मिता बख्शी की उम्मीदवारी पर नहीं है। मेरा विरोध तो राजनीति के उस घटनाक्रम से है जो छलिया की तरह छलता हुआ प्रतीत हुआ है- पहले दिनेश बजाज छले गए फिर शांतिलाल जैन छले गये... और इस प्रकार जोड़ासांकू के हिन्दीभाषी छले गये। अगर श्रीमती बख्शी को फर्स्टचान्स में ही उम्मीदवार घोषित किया जाता तो शायद इतना नहीं खलता। दीदी का अगर आगाज ऐसा तानाशाही है तो फिऱ अंजाम कैसा होगा... यह विचारणीय प्रश्न जरूर है।