शनिवार, 9 अप्रैल 2011

तीन सवाल

तीन सवाल
भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज ने राजनीति व राजनेताओं को कुछ सोचने पर मजबूर भले ही कर दिया हो पर मुहिम तब तक कारगर नहीं हो सकती जब तक आम आदमी इस मुहिम से अपने आपको न जोड़े-सिर्फ नारे लगाने व भ्रष्टाचार के विरोध में बैनर लेकर गलियों में निकलने से भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता-हमको हमसे यह मुहिम प्रायोगिक रूप से शुरू करनी होगी.... क्या हम अपना कोई काम सरकारी अधिकारियों से करवाते समय काम के एवज में उन्हें रिश्वत देना बंद कर सकते हैं.. विरोध के स्वर निचले स्तर से उठने होंगे... अगर हम ऐसा संकल्प लेते है तो इसका अर्थ बाबा रामदेव व अन्ना हजारे का समर्थन करते है नहीं तो समर्थन के नाम पर मजाक ही लगता है।
विश्वकप क्रिकेट के फायनल मैच में १९८३ के वर्ल्ड कप विजेता टीम के अधिनायक कपिल देव को आमंत्रित नहीं करना यह जताता है कि बीसीसीआई इस खेल के भावनात्मक पहलू से कितनी गरीब है। इस वर्ल्ड कप की जीत से कहीं अधिक गहरी १९८३ की वो जीत थी जिसने भारत को विश्व विजेता तब बनाया था जब उसकी दावेदारी दूर-दूर तक नहीं थी। भारतीय क्रिकेट प्रेमी उस समय का स्वाद क्या कभी भूल सकते हैं?
उस जीत के नायक का असम्मान करोड़ो भारतीय क्रिकेट प्रेमियों का असम्मान है। उचित तो यह था कि वानखेड़े स्टेडियम में कपिल और उसकी समूची टीम का सार्वजनिक अभिनन्दन किया जाता। भारतीय क्रिकेट कन्ट्रोल बोर्ड को अपनी इस शर्मनाक भूल के लिए कपिल देव से माफी मांगनी चाहिए। क्रिकेट प्रेमियों को इस प्रसंग पर अपना विरोध क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड व सरकार को भेजना चाहिए।
नवरात्रा के महोत्सव में अगर कोई समाज अपनी अराध्य देवी की पूजा अर्चना का उत्सव वैचारिक भिन्नता की वजह से अपने-अपने तर्क देकर अलग-अलग स्थान पर करवाता है.... तो बात इसलिये अखरती है कि आराध्य देवी के नाम पर भी उनके बच्चे अपनी इगो प्राब्लम को छोड़ कर एक नहीं हो पाये और जब देवी मां का शक्ति पीठ राजरहाट में भव्यता के साथ प्राण प्रतिष्ठित है तब फिर नवरात्रा का महोत्सव तो वहीं होना चाहिए-फिर अलग-अलग स्थानों पर इस उत्सव को मनाना उचित नहीं लगता क्योंकि मॉं के प्राण प्रतिष्ठित स्थान की बराबरी को किराये के स्थान नहीं कर सकते जहां मां की मूर्ति उत्सव तक ही रहती है। शक्ति की पूजा अर्चना में भक्ति का दर्शन ही होना चाहिए.... दौलत और दम्भ का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। देवी मां के स्थायी मंदिर...शक्ति पीठ की महत्ता को हम समझे तथा किराये के स्थानों में धन की बर्बादी व दिखाऊ प्रदर्शनों से बचे। अपनी कुल देवी की पूजा में मानसिकता से पवित्र भाव में समर्पित रहे अपने आपको आगे दिखाने की प्रवृत्ति से बचे।

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